छोटू को गणित से डर लगता था। उसे लगता था कि गिनतियाँ उसके पीछे-पीछे चलती हैं और मौक़ा मिलते ही उसे पकड़ लेंगी। इसीलिए जब भी तीसरी घंटी बजती, जो गणित की कक्षा की घंटी थी, वह पेट पकड़कर बैठ जाता।
उस दिन भी उसने वही किया। "मास्टरजी, पेट में दर्द है।"
मास्टरजी ने ऊपर से नीचे उसे देखा। "ठीक है, जाकर बाहर बरामदे में बैठ जाओ।"
छोटू बरामदे में पहुँचा तो वहाँ चपरासी काका हमेशा की तरह अपने स्टूल पर बैठे थे। उनके हाथ में पीतल की घंटी थी और सामने घड़ी। काका हर पीरियड के बाद घंटी बजाते थे, पर आज उन्होंने छोटू को देखकर घंटी रोक ली।
"पेट दुख रहा है कि गणित?"
छोटू झेंप गया। "गणित।"
काका ठहाका मारकर हँसे। "मैं तुम्हें एक बात बताऊँ? मैं अनपढ़ हूँ, पर रोज़ का पूरा हिसाब मुझे आता है।"
"कैसे?"
"देखो, घंटी कितनी बार बजनी है? पहली घंटी एक बार, दूसरी दो बार, तीसरी तीन बार। जब तक मैं गिन न लूँ, कोई पीरियड नहीं बदलता। छुट्टी की घंटी बजाने के लिए मुझे ठीक बारह बार बजाना पड़ता है। एक भी कम या ज़्यादा, तो बच्चे जल्दी चले जाएँ या देर तक बैठे रहें।"
छोटू ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया था। "मतलब, तीसरी घंटी तीन बार?"
"और वह देखो," काका ने सामने मैदान की ओर इशारा किया, "वहाँ चार पेड़ हैं, हर पेड़ पर तीन चिड़ियाँ हैं। कितनी चिड़ियाँ हुईं?"
छोटू ने उँगलियों पर गिना। "बारह।"
"वाह! तुमने तो गुणा कर दिया।"
"यह गुणा था?" छोटू की आँखें फैल गईं।
"गणित और क्या है? चीज़ों को ठीक से गिनना।" काका ने घंटी उसके हाथ में थमा दी। "लो, आज की तीसरी घंटी तुम बजाओ, ठीक तीन बार।"
छोटू ने घंटी पकड़ी। उसका हाथ काँप रहा था। उसने एक, दो, तीन बार घंटी बजाई। आवाज़ पूरे स्कूल में गूँज गई, और बच्चे कक्षाओं से झाँकने लगे।
मास्टरजी बरामदे में आए। उन्होंने काका को देखा, फिर छोटू को। "पेट दर्द कैसा है?"
छोटू मुस्कुराया। "ठीक हो गया, मास्टरजी। अंदर आ जाऊँ? आज गुणा सीखना है।"
कक्षा में उसने पहली बार हाथ उठाकर जवाब दिया। उस दिन के बाद वह रोज़ तीसरी घंटी से पहले बरामदे की तरफ़ देखता, और काका उसे आँख मारकर घंटी बजाने का इशारा कर देते।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026