एक छोटे-से बीज को मिट्टी के नीचे बहुत अँधेरा लगता था। वह रोज़ सोचता, "मैं कब बाहर निकलूँगा? यहाँ तो कुछ दिखता ही नहीं।"
ऊपर की ओर से बारिश की बूँदें आईं और मिट्टी में रिस गईं। बीज को ठंडक लगी। उसने पूछा, "तुम कौन हो?"
"मैं पानी हूँ। तुम्हें उगाने आई हूँ।"
"पर मैं तो बहुत छोटा हूँ," बीज ने कहा। "मुझसे क्या होगा?"
पानी हँसकर आगे बढ़ गया।
कुछ दिन बाद एक केंचुआ आया, जो मिट्टी को ढीला कर रहा था। "तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" बीज ने पूछा।
"मैं तुम्हारे लिए रास्ता बना रहा हूँ," केंचुए ने कहा। "जब तुम ऊपर जाना चाहोगे, तो मिट्टी कड़ी न लगे।"
बीज को अजीब-सा लगा। उसने कभी किसी से कुछ नहीं माँगा था, फिर भी सब उसकी मदद कर रहे थे।
एक सुबह बीज ने महसूस किया कि उसके भीतर कुछ हिल रहा है। एक पतली-सी जड़ नीचे को गई और एक नन्हा हरा अंकुर ऊपर की ओर चल पड़ा। मिट्टी हटती गई, और अचानक उसे धूप का एक गर्म टुकड़ा मिला।
"वाह!" अंकुर ने कहा। "यह तो बहुत सुंदर है!"
धूप मुस्कुराई। "मैं हर रोज़ आऊँगी। तुम बस बढ़ते रहना।"
कुछ महीनों में वह नन्हा बीज एक छोटा पौधा बन गया, फिर बड़ा पेड़। उसकी डालियों पर चिड़ियाँ बैठने लगीं। एक दिन एक बच्चा उसके नीचे आकर बोला, "माँ, यह पेड़ कितना बड़ा है!"
पेड़ ने हवा में अपनी पत्तियाँ हिलाईं। वह मन ही मन मुस्कुराया। उसे याद था कि कभी वह इतना छोटा था कि सोचता था, उससे कुछ नहीं होगा।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026