मीना की मिट्टी की गुल्लक पूरे डेढ़ साल पुरानी थी। उस पर उसने लाल रंग से एक छोटी-सी साइकिल बनाई थी, ताकि हर बार सिक्का डालते समय याद रहे कि वह किसलिए जमा कर रही है। गुल्लक हिलाने पर अब भारी खनक आती थी।
"पापा, कितना हो गया होगा?" वह रोज़ पूछती।
पापा हँसकर कहते, "जब तक साइकिल भर की आवाज़ न आए, तब तक मत फोड़ना।"
मीना के पास कुल मिलाकर सात सौ बीस रुपये जमा थे, और साइकिल की दुकान पर लाल रंग की छोटी साइकिल नौ सौ रुपये की थी। बस बयासी दिन और, फिर वह उसे ख़रीद लेगी।
एक शाम पड़ोस की सुमन आंटी घबराई हुई आईं। उनके बेटे बंटी को तेज़ बुख़ार था, और डॉक्टर ने दवाइयाँ लिखी थीं, पर पैसे पूरे नहीं थे। पापा ने जेब टटोली, उनके पास भी उस हफ़्ते पूरे पैसे नहीं थे।
मीना चुपचाप अपने कमरे में चली गई। वह गुल्लक को देर तक देखती रही। लाल साइकिल की तस्वीर जैसे उसे देख रही थी। उसने गुल्लक उठाई और बिना कुछ कहे ज़मीन पर पटक दी।
खनक के साथ सिक्के बिखर गए। उसने गिने, सात सौ बीस। वह उन्हें एक रूमाल में बाँधकर बाहर आई और सुमन आंटी के हाथ में रख दिया। "आंटी, दवाइयाँ ले आइए।"
आंटी की आँखें भर आईं। "मीना, यह तो तुम्हारी साइकिल के पैसे हैं। मैं ले नहीं सकती।"
"मैं फिर जमा कर लूँगी," मीना ने सहजता से कहा।
पापा दरवाज़े पर खड़े सब देख रहे थे। वे कुछ नहीं बोले। उन्होंने मीना के सिर पर हाथ फेरा, फिर चुपचाप अपनी पुरानी घड़ी उतारी और आंटी को देते हुए बोले, "बाक़ी रक़म के लिए इसे गिरवी रख लीजिए। कल बंटी ठीक हो जाए, तब लौटा दीजिएगा।"
बंटी तीन दिन में ठीक हो गया। आंटी ने सबसे पहले मीना के पैसे लौटाए, पर मीना ने मना कर दिया। "रख लीजिए, आंटी। यह अब बंटी की दवा के पैसे नहीं, उसके ठीक होने की ख़ुशी के हैं।"
उसी रविवार पापा उसे साइकिल की दुकान पर ले गए। दुकानदार ने लाल साइकिल बाहर निकाली। मीना ने पैसे के लिए अपनी जेब टटोली, तो पापा ने रोक दिया।
"मीना, तुम्हारे पैसे तो तुमने कहीं और लगा दिए। यह साइकिल तुम्हें उसी का इनाम है।" पापा ने रसीद पर उसका नाम लिखवाया। "और याद रखना, रसीद संभालकर रखना, पर असली रसीद वह है जो तुमने उस दिन अपने अंदर लिख ली थी।"
मीना ने साइकिल की घंटी बजाई। टिन-टिन की आवाज़ गली में गूँज गई। उसने सोचा कि अब नई गुल्लक ख़रीदेगी, पर इस बार उस पर साइकिल नहीं, एक दिल बनाएगी।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026