दादाजी के कमरे में अलमारी के ऊपर एक भूरा रेडियो रखा रहता था। उस पर धूल की परत जम चुकी थी। जब से दादाजी गए थे, कमरे का दरवाज़ा कम ही खुलता था।
अर्पित ने घर की सफ़ाई के दिन वह रेडियो उतारा। उसमें कुछ पुराने सेल पड़े थे, जंग खाए हुए, और एंटीना ज़रा टेढ़ा हो गया था। "यह तो कबाड़ है," उसने माँ से कहा। "कबाड़ी को दे दें? पाँच-सात सौ रुपये मिल जाएँगे।"
माँ ने रेडियो की तरफ़ देखा, फिर कुछ नहीं बोलीं। बस इतना कहा, "तुम्हारी मर्ज़ी।"
अर्पित को माँ की चुप्पी खटकी। उसने सोचा कि बेचने से पहले एक बार चलाकर देख लेना चाहिए। उसने नए सेल ख़रीदकर डाले और घुंडी घुमाई। खरखराहट के बाद एक आवाज़ उभरी, "यह आकाशवाणी है। अब आप सुनेंगे फ़रमाइशी गीतों का कार्यक्रम..."
रेडियो चल पड़ा था। अर्पित को अचानक याद आया कि बचपन में हर शाम सात बजकर दस मिनट पर इसी कमरे से गाने की आवाज़ आती थी। दादाजी आराम-कुर्सी पर बैठकर चाय पीते और आँखें मूँदकर सुनते। वह अक्सर उनकी गोद में बैठकर पूछता था, "दादाजी, गाना कौन गा रहा है?" और दादाजी हर बार एक ही जवाब देते, "जिसे सुनने वाला सबसे ज़्यादा चाहता है।"
उसने रेडियो के पीछे का ढक्कन खोला। अंदर सेल रखने की जगह के नीचे एक मुड़ा हुआ काग़ज़ चिपका था। उसने सावधानी से उसे निकाला। वह दादाजी की लिखावट थी।
"अर्पित के लिए। जब यह रेडियो चल जाए तो समझ लेना कि तुम इसे कबाड़ नहीं समझते। हर शाम सात बजकर दस मिनट पर मैं इसे इसलिए चलाता था कि तुम्हारी पसंद का गाना कभी न कभी बजेगा, और तुम पास बैठे होगे। अब तुम बड़े हो गए हो और शहर में हो। रेडियो को चलता रखना, घर में आवाज़ बनी रहे तो लगता है कोई है।"
अर्पित देर तक काग़ज़ को पकड़े बैठा रहा। उसकी आँखों के सामने धुँधला-सा दृश्य तैर गया: आराम-कुर्सी, चाय, और रेडियो पर बजता वही पुराना गीत।
उसी समय घड़ी में सात बजकर दस मिनट हुए। रेडियो पर घोषणा हुई, "अगला गीत हमारे एक पुराने श्रोता के नाम..." और एक जानी-पहचानी धुन बज उठी।
माँ दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस आकर अर्पित के पास बैठ गईं।
कबाड़ी को फ़ोन कभी नहीं किया गया। रेडियो फिर से अलमारी के ऊपर रखा गया, इस बार धूल पोंछकर, और हर शाम सात बजकर दस मिनट पर कमरे से गाने की आवाज़ आने लगी।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026