सुखिया के गाँव से स्कूल सात किलोमीटर दूर था। लड़कियाँ आठवीं के बाद पढ़ना छोड़ देती थीं, क्योंकि पैदल इतना रास्ता तय करना किसी के बस की बात नहीं मानी जाती थी।
सुखिया नवीं में आई तो उसके पिता ने कहा, "बेटी, अब बस कर। घर का काम सीख।"
सुखिया ने कुछ नहीं कहा। वह उस रात छत पर बैठी तारे गिनती रही। अगली सुबह वह सरपंच के घर पहुँची। वहाँ आँगन में एक पुरानी साइकिल पड़ी थी, जंग लगी, पहिए पिचके हुए।
"चाचा, यह साइकिल कब से पड़ी है?"
"बरसों से। कोई चलाता ही नहीं।"
"मुझे दे दीजिए। मैं इसे ठीक करके लौटा दूँगी, या आप बताएँ तो काम करके चुका दूँगी।"
सरपंच हँस पड़े। "ले जा, बिटिया। पर चलाना सीखेगी कैसे?"
उसने साइकिल गाँव के मैकेनिक कालू भैया को दिखाई। कालू ने पहिए में हवा भरी, चेन कसी और बोला, "बाक़ी तू जान।"
पहले हफ़्ते में सुखिया चौदह बार गिरी। घुटने छिल गए, हथेलियाँ कट गईं। पर पंद्रहवीं बार वह गिरते-गिरते सँभली और सीधी सड़क पर निकल गई। उसकी चुन्नी हवा में उड़ रही थी और वह खिलखिलाकर हँस रही थी।
अगले महीने से वह रोज़ साइकिल से स्कूल जाने लगी। पहले दिन गाँव वाले उसे देखते रहे, कुछ ने ताने मारे, कुछ ने सिर हिलाया।
सालभर बाद उसी रास्ते पर तीन और लड़कियाँ साइकिल चलाती दिखीं। फिर पाँच। फिर पूरा झुंड।
सरपंच ने उस दिन पंचायत में कहा, "हमने बरसों एक साइकिल जंग खाने दी। एक लड़की ने उसे चलाकर पूरे गाँव का रास्ता खोल दिया।"
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026