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लोककथा
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चतुर सियार और कुआँ

कुएँ में गिरा सियार, भोली बकरी और भरोसे की क़ीमत।

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एक जंगल में एक सियार रहता था, जो अपनी चालाकी पर बहुत इतराता था। एक दिन भागते-भागते वह एक सूखे कुएँ में गिर गया। कुआँ गहरा था और दीवारें चिकनी। बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखा।

थोड़ी देर बाद ऊपर से एक बकरी ने झाँककर पूछा, "सियार भाई, वहाँ क्या कर रहे हो?"

सियार ने तुरंत चेहरा खिला लिया। "अरे बहन, यहाँ का पानी इतना मीठा है कि पूछो मत! तुम भी आ जाओ।"

बकरी को प्यास लगी थी। वह कूद पड़ी। जैसे ही वह नीचे पहुँची, सियार उसकी पीठ पर चढ़ा, फिर उसके सींगों के सहारे ऊपर निकल गया।

"धन्यवाद, बहन!" उसने हँसकर कहा और चल दिया।

बकरी ऊपर देखती रह गई। तब पास से एक बूढ़ा बैल गुज़र रहा था। उसने पूरी बात सुनी और रस्सी का एक सिरा कुएँ में लटका दिया। "पकड़, और चढ़ आ।"

बकरी निकल आई। उसने बैल को धन्यवाद कहा और बोली, "सियार ने मुझसे छल किया।"

बैल मुस्कुराया। "छल करने वाला कुछ दिन खुश रहता है, पर रास्ता सबसे आख़िर में उसी का बिगड़ता है।"

उधर सियार जंगल में घूम रहा था। कुछ दिन बाद वह शिकारी के जाल में फँस गया। उसने आसपास सबसे मदद माँगी, पर किसी ने उस पर भरोसा नहीं किया। जिनके साथ उसने छल किया था, वे सब दूर खड़े देखते रहे।

आख़िर में वही बूढ़ा बैल आया और रस्सी काट दी। सियार ने सिर झुकाकर पूछा, "तुमने क्यों बचाया, मैंने तो तुम्हारी बहन को..."

"मैं तुम्हारे जैसा नहीं हूँ," बैल ने कहा और आगे बढ़ गया।

कहते हैं, उस दिन के बाद सियार की चालाकी में थोड़ी शर्म घुल गई।

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026