मंडी के कोने में सेठ गोविंद की किराने की दुकान थी। उनकी तराज़ू के बारे में पूरे शहर में एक ही बात मशहूर थी: "सेठ के यहाँ एक ग्राम भी कम नहीं मिलता।"
एक दिन दुकान पर एक नया लड़का काम करने आया, मोहन। पहले ही हफ़्ते उसने देखा कि सेठ तराज़ू के नीचे एक छोटा-सा बाट रखकर सामान तौलते हैं। बाट सामान से हल्का था, पर तराज़ू बराबर दिखता था।
मोहन चुप रहा। रात को उसने सेठ से कहा, "मालिक, आपकी तराज़ू तो..."
सेठ चौंके। "क्या कहना चाहते हो?"
"कुछ नहीं, बस बाट थोड़ा सा हल्का लगता है।"
सेठ ने गहरी साँस ली। "बेटा, बाज़ार में हर कोई कम तौलता है। मैं तो कम से कम इतना कम करता हूँ कि किसी को पता न चले।"
अगले दिन एक बूढ़ी महिला पाँच रुपये का आटा लेने आई। मोहन ने तराज़ू उठाई, ईमानदारी से तौला और दो मुट्ठी ज़्यादा डाल दिया। "अम्मा, यह आपके लिए।"
बूढ़ी महिला की आँखों में चमक आई। "बेटा, भगवान तेरा भला करे।"
सेठ ने सब देखा। शाम को उन्होंने मोहन को बुलाया। "तूने आज घाटा कराया है।"
"मालिक, हिसाब देख लीजिए। आज की बिक्री पहले से ज़्यादा है।"
सच में, उस दिन बिक्री बढ़ी थी, क्योंकि बूढ़ी महिला ने पूरे मोहल्ले में बात फैला दी थी।
सेठ बहुत देर चुप रहे। फिर बोले, "कल से वह छोटा बाट हटा दो।"
कुछ ही महीनों में दुकान की साख बदल गई। लोग कहते, "सेठ गोविंद की तराज़ू में अब पूरा विश्वास मिलता है।"
सेठ को समझ आया कि जो कमाई बाट के नीचे दबाकर होती थी, उससे कहीं बड़ी कमाई भरोसे की थी।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026