बारिश की पहली फुहार के साथ डाकिया रामभरोसे अपनी साइकिल पर गली में आया। पूरा मोहल्ला जानता था कि उसकी घंटी की आवाज़ मतलब कुछ न कुछ आया है, चिट्ठी, मनीऑर्डर, या कभी-कभी कोई ख़बर।
आज उसके थैले में एक अजीब लिफ़ाफ़ा था। पता अधूरा, सिर्फ़ इतना लिखा था: "पीपल वाले घर की बूढ़ी अम्मा को।" भेजने वाले का नाम नहीं, पर टिकट पर पिछले महीने की मुहर।
रामभरोसे ने पूरे मोहल्ले में पूछा। पीपल वाले घर तो दो थे। एक में विधवा सरला जी रहती थीं, दूसरे में कोई नहीं, बस ताला पड़ा था। उसने सरला जी का दरवाज़ा खटखटाया।
"मेरे नाम की चिट्ठी?" सरला जी ने आँखें सिकोड़ीं। "इतने बरसों में तो कभी नहीं आई।"
लिफ़ाफ़ा खोला गया। भीतर एक सादा काग़ज़ था, कोमल लिखावट में:
"अम्मा, आप शायद मुझे नहीं पहचानेंगी। कई बरस पहले मैं इस मोहल्ले में पढ़ने आई थी। आपकी छत से रोज़ मुझे पानी और रोटी मिलती थी, आप कभी कुछ पूछती नहीं थीं। आज मैं शिक्षिका हूँ। आपके उस एक निवाले ने मुझे कई साल सँभाला। धन्यवाद कहना बहुत देर से हुआ। ईश्वर करे यह चिट्ठी आप तक पहुँचे।"
सरला जी चुप बैठी रहीं। बाहर बारिश तेज़ हो गई। फिर वे धीमे से बोलीं, "याद आया... सीमा। हर शाम खिड़की से झाँकती थी, सोचती थी मुझे दिखता नहीं।"
रामभरोसे की आँखों में भी नमी थी। उसने टोपी ठीक की और कहा, "अम्मा, चिट्ठी देर से आई, पर ठीक पते पर आई।"
उस दिन से सरला जी ने फिर से छत पर एक थाली रखनी शुरू कर दी। जो भी भूखा गुज़रे, उसके लिए।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026