बहुत पुरानी बात है। एक राजा के महल में चाँदी का एक आईना था। कहते थे कि वह आईना कभी झूठ नहीं बोलता। उसके सामने जो खड़ा होता, उसे अपना असली रूप दिखता: चेहरा नहीं, मन।
राजा इस आईने का बड़ा शौक़ीन था, पर उसके सामने कभी खड़ा नहीं होता था। दरबारी रोज़ राजा की प्रशंसा करते, और राजा खुश रहता। आईने पर चादर पड़ी रहती।
एक दिन महल में नया सेवक आया, कालू। उसे चादर की बात पता नहीं थी। झाड़ू लगाते हुए उसने चादर हटाकर आईना चमका दिया।
उसी समय राजा उधर से गुज़रे। उन्हें अपनी झलक दिखी, और वे ठिठक गए। आईने में उनका मुकुट चमक रहा था, पर चेहरे पर एक थका हुआ, डरा हुआ आदमी था, जो हर समय यह सोचता रहता कि कोई उससे नाराज़ तो नहीं।
राजा ने क्रोध में पूछा, "यह कैसा आईना है?"
कालू ने हाथ जोड़े। "महाराज, मुझे नहीं पता। मैंने तो बस धूल पोंछी है।"
राजा देर तक खड़े रहे। फिर धीमे से बोले, "तुम रोज़ इसे साफ़ करना।"
उस दिन से राजा रोज़ सुबह आईने के सामने कुछ मिनट खड़े होते। कभी उन्हें अपने भीतर का अहंकार दिखता, कभी दया, कभी भय। धीरे-धीरे उन्होंने दरबारियों की चापलूसी पर कान देना छोड़ दिया और प्रजा की बात सुनने लगे।
लोग कहते हैं कि राजा के अंतिम दिनों में एक बार किसी ने पूछा, "महाराज, आपका सबसे बड़ा सलाहकार कौन था?"
राजा मुस्कुराए। "वह जो मेरी तारीफ़ नहीं करता था, बस मुझे मुझ जैसा दिखाता था। और उसे साफ़ रखने वाला कालू।"
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026