पहली तनख़्वाह के दिन मनोज सुबह से ही बेचैन था। एटीएम से पैसे निकालकर उसने गिने। अठारह हज़ार रुपये। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, जैसे नोट नहीं, कोई जीवित चीज़ पकड़ी हो।
उसकी सूची तैयार थी। नए जूते, जो पाँच महीने से दुकान की शीशे वाली अलमारी में उसे ताकते थे। दोस्तों को पार्टी। और एक अच्छी-सी घड़ी।
घर की ओर लौटते हुए उसकी नज़र फुटपाथ पर बैठे मोची पर पड़ी, जो पिताजी के पुराने जूते सिल रहा था। यह देखकर उसे याद आया कि कल रात पिताजी ने जूते उतारते हुए कहा था, "बेटा, इस सोल में छेद हो गया है, पर अभी चल जाएगा।"
मनोज ठिठक गया। पिताजी पैंतीस साल से ऐसे ही कहते आए थे: अभी चल जाएगा। उनकी चप्पल, उनकी कमीज़, उनकी ऐनक। सब अभी चल जाता था, ताकि मनोज की किताबें, फ़ीस और कोचिंग चलती रहे।
वह जूते की दुकान पर गया। अपने लिए नहीं, पिताजी के लिए चमड़े के भूरे जूते ख़रीदे। फिर माँ की साड़ी, और बहन के लिए एक किताब।
शाम को उसने डिब्बा पिताजी के सामने रखा। पिताजी ने बिना खोले पूछा, "क्या है?"
"खोलकर देखिए।"
पिताजी ने जूते निकाले, काफ़ी देर तक उन्हें उलटते-पलटते रहे। फिर बोले, "इतने महँगे? वापस कर दे, पैसे बचा।"
मनोज की आँखें भर आईं। "पिताजी, आपने जो बचाया, उसी से तो यह तनख़्वाह बनी है।"
पिताजी चुप हो गए। उन्होंने धीरे से जूते पहने, कुछ क़दम चले और बोले, "आरामदायक हैं।" उनकी आवाज़ में वह नमी थी जो मनोज ने पहली बार सुनी थी।
उस रात मनोज के पास अठारह हज़ार नहीं, तीन हज़ार रुपये बचे थे। पर उसे लगा कि उसने पहली तनख़्वाह का सबसे अच्छा हिसाब चुका दिया है।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026