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लोककथा
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कछुआ और घोड़ा

एक नई शर्त पर कछुए और घोड़े की दौड़ (जानी-पहचानी कथा का नया रूप)।

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जंगल में एक बार खेल का मेला लगा। सबसे बड़ी दौड़ घोड़े और कछुए के बीच तय हुई। सब हँस पड़े। घोड़ा तो पलक झपकते मंज़िल तक पहुँच जाता, और कछुए को वहाँ तक पहुँचने में दिन लग जाते।

घोड़े ने कहा, "कछुए भाई, मैं तुम्हें आधा रास्ता पहले चलने दूँगा।"

कछुए ने मुस्कुराकर कहा, "मुझे कोई छूट नहीं चाहिए, बस दौड़ को सही शर्त से चलने दो।"

"कौन-सी शर्त?"

"रास्ता मैं चुनूँगा।"

घोड़े ने हँसकर हामी भर दी। उसे कौन-सा डर था? दौड़ शुरू हुई। घोड़ा हवा की तरह भागा, पर कछुआ सीधे नदी की ओर मुड़ गया, जहाँ वह तैरने लगा। मंज़िल नदी के उस पार थी।

घोड़ा नदी के किनारे पहुँचा तो हक्का-बक्का रह गया। नदी चौड़ी थी, धार तेज़ थी, और वह तैरना नहीं जानता था। वह किनारे पर इधर-उधर टहलता रहा, कभी पुल ढूँढता, कभी उथली जगह।

कछुआ आराम से तैरता हुआ दूसरी तरफ़ पहुँच गया। जब घोड़ा आख़िरकार तीन घंटे चक्कर लगाकर पुल से घूमकर पहुँचा, तब तक कछुआ मंज़िल पर बैठा सुस्ता रहा था।

घोड़े ने झुँझलाकर कहा, "यह तो धोखा है!"

कछुआ शांति से बोला, "मैंने कोई धोखा नहीं दिया। तुमने शर्त मान ली थी, बिना सोचे। जीत हमेशा तेज़ दौड़ने वाले की नहीं होती, उसकी होती है जो अपनी ताक़त पहचानकर रास्ता चुनता है।"

घोड़ा पहली बार चुप हो गया। उसने कछुए से हाथ मिलाया और बोला, "अगली बार मैं भी सोचकर शर्त मानूँगा।"

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026