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लघुकथा
लघुकथा

रेल की खिड़की से

रात की गाड़ी में एक दादी और पहली पहल करने का साहस।

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रात की गाड़ी थी और डिब्बा लगभग ख़ाली। खिड़की के पास बैठी नेहा ने सिर टिकाया और बाहर अँधेरे को भागते देखा। बीच-बीच में किसी छोटे स्टेशन की पीली बत्ती आती और पीछे छूट जाती।

सामने की सीट पर एक बूढ़ी महिला बैठी थीं। हाथ में सूती थैला, आँखों में अनकही थकान। थोड़ी देर बाद उन्होंने पूछा, "बिटिया, यह गाड़ी इटारसी कब पहुँचेगी?"

"सुबह पाँच बजे के आसपास, दादी।"

"अच्छा।" वे चुप हो गईं। फिर कुछ सोचकर बोलीं, "मेरा बेटा वहीं रहता है। चार साल बाद जा रही हूँ।"

नेहा ने मुड़कर देखा। "चार साल? क्यों नहीं गईं पहले?"

दादी हँसीं। "जाने का मन तो रोज़ होता था। पर हर बार लगता था कि पहले उसका फ़ोन आए, पहले वह बुलाए। इसी इंतज़ार में चार साल निकल गए।"

"तो अब?"

"अब सोचा कि बुलावे का इंतज़ार करने से अच्छा है, ख़ुद चल दिया जाए। माँ को बुलावे की ज़रूरत थोड़े ही होती है।"

नेहा ने अपना मोबाइल निकाला। उसमें पिताजी का नंबर आठ महीने से बिना कॉल के पड़ा था, एक छोटी-सी बहस के बाद से। उसने भी हर बार सोचा था: पहले वे करें।

उसने नंबर देखा, फिर खिड़की के बाहर, जहाँ अँधेरा अब हल्का होने लगा था।

"दादी, आप सही कह रही हैं," उसने कहा और कॉल का बटन दबा दिया।

घंटी बजी। एक बार। दो बार। तीसरी बार में उधर से भर्राई हुई आवाज़ आई, "हेलो?"

नेहा का गला रुँध गया। "पिताजी... मैं हूँ।"

खिड़की के बाहर भोर का पहला उजाला उतर रहा था।

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026