बहुत पुरानी बात है। एक गाँव था, जहाँ रात होते ही घना अँधेरा छा जाता था। गाँव के बीचोबीच एक बड़े से चबूतरे पर एक लालटेन जलती थी, जिसे बुज़ुर्ग मुखिया गोपाल हर शाम अपने हाथ से जलाता था। सब कहते थे कि यह लालटेन गाँव की बसावट के पहले दिन से जल रही है।
गाँव की रीत थी कि हर घर शाम को उसी लालटेन से अपनी बत्ती जला ले। औरतें मिट्टी के दीये लेकर आतीं, बच्चे छोटी-छोटी लालटेनें, और एक-एक करके हर बत्ती जल उठती थी। देखते-देखते पूरा गाँव रोशनी से भर जाता।
एक दिन गाँव में एक परदेसी आया। थका हुआ, धूल से सना। वह चबूतरे के पास रुका और पूछा, "यह लालटेन कितनी बड़ी है कि पूरे गाँव को रोशनी देती है?"
गोपाल मुस्कुराया। "यह लालटेन तो बहुत छोटी है, भाई।"
"फिर इतने सारे दीये इससे कैसे जल जाते हैं? यह तो ख़ाली हो जाती होगी?"
"ख़ाली कैसे होगी?" गोपाल ने कहा। "एक दीया जलाने से लालटेन का तेल कम नहीं होता। मेरी लौ से जितने दीये जल जाएँ, मेरी लौ उतनी ही रहती है। जो कम होता है, वह अँधेरा होता है।"
परदेसी हँस पड़ा। "ऐसा कैसे हो सकता है?"
"देख लो।" गोपाल ने अपने हाथ की बत्ती परदेसी के हाथ में पकड़ाई और उस पर लालटेन की लौ छुआ दी। बत्ती जल उठी। फिर उसने कहा, "अब तुम इसे किसी और को दे दो।"
परदेसी ने पास खड़ी एक बच्ची की बत्ती जला दी। फिर बच्ची ने अपनी माँ की। देखते-देखते चबूतरे पर दर्जनों लौ झिलमिलाने लगीं। मुखिया की लालटेन वैसी की वैसी जल रही थी।
परदेसी बहुत देर तक चुप रहा। फिर बोला, "मैं सौ गाँव घूमा हूँ, और हर जगह लोग अपनी रोशनी छिपाकर रखते हैं। यहाँ पहली बार देखा कि रोशनी बाँटने से बढ़ती है।"
गोपाल ने कहा, "रोशनी की तो रीत ही बाँटने की है। जो अपने पास दबाकर रखे, वह ख़ुद अँधेरे में रहता है।"
परदेसी वहाँ तीन दिन रुका। जाते समय उसने अपने पास की एक छोटी-सी बत्ती मुखिया की लालटेन से जलवा ली और कहा, "मैं यह अगले गाँव तक ले जाऊँगा, और वहाँ से अगले तक।"
कहते हैं, उस दिन के बाद उस इलाक़े के हर गाँव में एक लालटेन जलने लगी, और हर लालटेन की लौ उसी पहली लालटेन से जली थी।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026