नुक्कड़ के पीपल के नीचे सुबह छह बजे से अम्मा की सब्ज़ी की टोकरी सज जाती थी। लौकी, भिंडी, हरी मिर्च और धनिया, सब कुछ क़रीने से। सबसे ख़ास थी उनकी तराज़ू, जिसके पलड़ों पर पीतल की चमक थी और बाट घिसकर चिकने हो चुके थे। लोग कहते थे कि अम्मा की तराज़ू बोलती है।
एक सुबह नगर निगम की गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक युवा अधिकारी उतरा, हाथ में फ़ाइल लिए। "अम्मा, यह जगह फुटपाथ है। यहाँ दुकान लगाना ग़ैरक़ानूनी है। कल से मत बैठना।"
अम्मा के हाथ रुक गए। "बेटा, पैंतीस बरस से यहीं बैठती हूँ।"
"नियम तो नियम हैं।" अधिकारी ने गाड़ी की ओर इशारा किया। "आज तो मैं टोकरी नहीं उठवा रहा, लेकिन कल से..."
अम्मा ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने धनिया की गड्डी बाँधी और पास खड़ी छोटी बच्ची को थमा दी। "ले बिटिया, घर ले जा, पैसे कल दे देना।"
अधिकारी देखता रहा। पूरे बाज़ार में किसी ने अम्मा के पक्ष में कुछ नहीं कहा, पर किसी ने उनसे सब्ज़ी लेना भी बंद नहीं किया। उल्टा, उस दिन भीड़ कुछ ज़्यादा थी। पोस्टमैन ने दो किलो आलू लिए, दर्ज़ी की पत्नी ने लौकी, और एक बूढ़े सज्जन ने बिना भाव पूछे पूरी टोकरी का एक हिस्सा उठा लिया।
अधिकारी तीन दिन बाद अकेला लौटा। इस बार वह वर्दी में नहीं था। उसने अम्मा के पास आकर पूछा, "अम्मा, एक किलो भिंडी देंगी?"
अम्मा ने तौली। तराज़ू का काँटा ठीक बीच में आकर ठहर गया। "ले, पूरी एक किलो।"
अधिकारी ने भिंडी देखी, तराज़ू देखी। "अम्मा, मैं उस दिन आपको हटाने आया था, और आज ख़रीदने आया हूँ।"
"पैंतीस साल से जो मेरी तराज़ू पर भरोसा करते हैं, वही मेरे असली अफ़सर हैं। तू भी देख ले, भरोसा करना है या नहीं।"
वह घर पहुँचा तो माँ ने सब्ज़ी देखकर कहा, "यह तो वैसी ही है जैसी तेरे बचपन में आती थी।" उसकी याद ताज़ा हो गई। वह भी इसी नुक्कड़ पर खड़ा रहा करता था।
अगले हफ़्ते नगर निगम की बैठक में उसने एक प्रस्ताव रखा: बाज़ार के किनारे एक निर्धारित पटरी, जहाँ छोटे सब्ज़ी वाले बैठ सकें, और जगह का किराया नाममात्र। प्रस्ताव पास हो गया।
पीपल के पास एक नई पटरी बनी और उस पर एक छोटी तख़्ती लगी, "सब्ज़ी बाज़ार।" अम्मा अपनी जगह पर बैठी रहीं। उन्होंने तख़्ती देखी, फिर तराज़ू को पोंछा और धीरे से कहा, "देखा, नियम भी आदमी ही बनाता है, और आदमी ही बदलता है।"
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026