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सामाजिक
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ग्यारह रुपये

रिक्शेवाले बिरजू की ईमानदारी और एक नई नौकरी।

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रिक्शा चलाने वाले बिरजू को सुबह की पहली सवारी ने पचास रुपये का नोट थमाया और उतर गया। बिरजू के पास खुले पैसे नहीं थे। उसने कहा, "साहब, ज़रा रुकिए, छुट्टे करवाता हूँ।"

सवारी जल्दी में थी। "रख ले, बाक़ी तू रख।"

भाड़ा उनतालीस रुपये था। बिरजू के हाथ में ग्यारह रुपये ज़्यादा रह गए। वह चौराहे पर खड़ा सोचता रहा। ग्यारह रुपये उसके लिए एक वक़्त की चाय और एक रोटी जितने थे।

उसने जेब में नोट रखा और सवारी ढूँढने निकल पड़ा। पर पूरे दिन उसके मन में वही बात चुभती रही। शाम को घर लौटते समय उसने देखा कि वही सवारी, कोट पहने, उसी चौराहे पर किसी को ढूँढती घूम रही है।

बिरजू ने रिक्शा रोका। "साहब, आप ही हैं सुबह वाले?"

"हाँ, मेरा बटुआ कहीं गिर गया है। तुम्हें मिला?"

"नहीं साहब, पर आपने सुबह ग्यारह रुपये ज़्यादा दे दिए थे।" उसने जेब से वही नोट निकाला।

सवारी हँस पड़ी। "अरे, वे तो मैंने तुझे छोड़ दिए थे।"

"साहब, दिया तो आपने जल्दी में था। मैं ग़रीब हूँ, पर बेईमान नहीं।"

सवारी देर तक उसे देखती रही। फिर बोली, "तू घर चल, चाय पिला। आज मेरा बटुआ गुम हुआ है, तो शायद तेरी ईमानदारी से सीखने का दिन है।"

अगली सुबह वही सवारी बिरजू के रिक्शे पर पाँच रुपये ज़्यादा देकर उतरी, और साथ में एक काग़ज़ दिया, जिस पर एक पता लिखा था। "मेरी फ़ैक्ट्री का है। कल से वहाँ चौकीदार की नौकरी तेरी।"

बिरजू ने पर्ची को माथे से लगाया और रिक्शा मोड़ दिया।

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026