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दीये की क़ीमत

बदलते बाज़ार में कुम्हार सुखिया के दीये और उनका नाम।

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दिवाली से दस दिन पहले की बात थी। कुम्हार सुखिया के आँगन में मिट्टी के दीयों की सैकड़ों क़तारें सूख रही थीं। चाक की घर्र-घर्र सुबह से शाम तक चलती रहती, और सुखिया की उँगलियाँ गीली मिट्टी में ऐसे खेलतीं जैसे कोई संगीत बजा रही हों।

इस बार बाज़ार बदल गया था। शहर के बड़े स्टोर में चीनी मिट्टी और मोम के चमकीले दीये आ गए थे, और वहाँ दाम भी अजीब थे, एक दीये के पंद्रह रुपये। सुखिया के दीये दस रुपये के दर्जन में बिकते थे, फिर भी ग्राहक कम आ रहे थे।

उसका बेटा मोहन शहर से कॉलेज की छुट्टी में लौटा था। उसने आँगन देखकर कहा, "बाबूजी, अब कौन आएगा यह सब ख़रीदने? लोग तो सब ऑनलाइन मँगवाते हैं।"

सुखिया ने चाक रोक दिया। "तो क्या मैं दीये बनाना छोड़ दूँ?"

"मैं ऐसा नहीं कह रहा। पर कुछ बदलना पड़ेगा।"

पिता-पुत्र बहस करते रहे। आख़िर में मोहन ने कहा, "बाबूजी, मैं इन पर रंग कर दूँ? और उनके साथ एक छोटा-सा काग़ज़ लगा दूँ, जिस पर लिखा हो कि यह दीया किसने बनाया।"

सुखिया हँसा। "दीये का क्या नाम, बेटा? दीया तो दीया होता है।"

"पर बनाने वाले का नाम हो, तो ख़रीदने वाला जान पाएगा कि उसके घर की रोशनी किसके हाथ से आई।"

अगले दिन मोहन ने दीयों पर गेरू और हल्दी से बेल-बूटे बनाए। छोटे-छोटे पर्चों पर लिखा: "यह दीया सुखिया कुम्हार के हाथों बना है, चाक पर, गाँव की मिट्टी से।" उसने दीयों के आठ-आठ के डिब्बे बनाए और उन्हें मोहल्ले के बाज़ार में एक छोटी मेज़ पर सजा दिया।

पहले दिन दो डिब्बे बिके, दूसरे दिन दस। तीसरे दिन एक बुज़ुर्ग महिला आईं, डिब्बा उठाया, पर्चा पढ़ा और बोलीं, "बेटा, ये सुखिया वही हैं जिनके दीये हम बरसों से जलाते आए हैं?"

मोहन ने सिर हिलाया।

"तो ये पाँच डिब्बे दे दो। और हाँ, पैसे पूरे लो। इतने सुंदर दीयों का दाम कम क्यों रखा है?"

मोहन ने क़ीमत दस की जगह पंद्रह रुपये दर्जन कर दी, पर ग्राहक कम नहीं हुए। दिवाली तक सुखिया का आँगन ख़ाली हो चुका था। आख़िरी रात, जब सबने घरों में दीये जला दिए, सुखिया चाक के पास अकेला बैठा रहा।

मोहन ने पूछा, "बाबूजी, दुखी हैं?"

"नहीं, बेटा," सुखिया ने कहा। उसने आँगन के बाहर पूरे मोहल्ले की ओर देखा, जहाँ दीयों की क़तारें झिलमिला रही थीं। "आज मेरे बनाए हज़ारों दीये जल रहे हैं। इनकी क़ीमत तो कोई तराज़ू नहीं तौल सकती।"

उसने चाक को हल्के से छुआ। "बस कल से फिर मिट्टी गूँधनी है। अगली दिवाली भी तो आएगी।"

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026