पुरानी किताबों की दुकान में काम करने वाली रीमा ने एक दिन एक मोटी-सी किताब उठाई, जिसके बीच में एक सूखा गुलाब और एक मुड़ा हुआ पुर्ज़ा रखा था। पुर्ज़े पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं: "अगर यह किताब तुम्हारे हाथ लगे, तो पन्ना सत्तासी खोलना।"
रीमा ने पन्ना सत्तासी खोला। वहाँ किसी ने पेंसिल से एक वाक्य रेखांकित किया था। "कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में सिर्फ़ किताब के बीच रखे फूल जैसे आते हैं: ज़्यादा जगह नहीं घेरते, पर हर बार पन्ना पलटने पर महक छोड़ जाते हैं।"
वह मुस्कुराई। किसी अजनबी की यह छोटी-सी भावना उसे बहुत अपनी लगी। उसने किताब के पहले पन्ने पर देखा। वहाँ एक नाम और पता लिखा था: "सुधा मेहरा, ग्यारह, बाग़ वाली गली।"
अगले इतवार रीमा उस पते पर गई। दरवाज़ा एक बुज़ुर्ग औरत ने खोला। "सुधा जी?"
"हाँ, कहिए।"
रीमा ने किताब आगे बढ़ाई। "यह आपकी है। मुझे आपकी दुकान में मिली।"
सुधा जी की आँखें भर आईं। "मैंने इसे बरसों पहले एक दोस्त को दिया था। वह इसे लौटाने कभी नहीं आया।"
"उसने शायद इसे लौटाया नहीं, पर इसे सहेजकर रखा। फूल अब भी इसके भीतर है।"
सुधा जी ने सूखा गुलाब हथेली पर रखा और देर तक देखती रहीं। फिर रीमा से बोलीं, "चाय पियोगी? बहुत दिनों बाद कोई मेरी किताब की कहानी सुनने आया है।"
रीमा उस शाम बहुत देर तक वहीं बैठी रही। किताबें बेचने वाली लड़की को पहली बार लगा कि हर किताब के भीतर एक अधूरी बातचीत छिपी होती है।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026