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डाकघर की खिड़की

एक जन्मदिन की चिट्ठी और बाबू दीनानाथ की आख़िरी गाड़ी।

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शहर के पुराने डाकघर की खिड़की पर बैठने वाले बाबू दीनानाथ तीस साल से वही कुर्सी सँभाल रहे थे। पहले वहाँ चिट्ठियों की क़तार लगती थी, अब इक्का-दुक्का लोग आते थे।

एक शाम खिड़की बंद करने का समय हुआ ही था कि एक बूढ़े सज्जन हाँफते हुए पहुँचे। हाथ में एक पुराना लिफ़ाफ़ा था। "बाबू, यह चिट्ठी आज ही पहुँचनी है। मेरी पत्नी का जन्मदिन है।"

दीनानाथ ने घड़ी देखी। "कल सुबह भेज दूँगा।"

"नहीं, आज चाहिए। वह दूसरे शहर में है, अस्पताल में। फ़ोन नहीं चलाती, बस चिट्ठियाँ पढ़ती है।"

दीनानाथ की उँगलियाँ रुक गईं। उन्होंने लिफ़ाफ़ा खोला नहीं, बस पता देखा। अस्पताल वही था जहाँ उनकी अपनी माँ ने आख़िरी साँस ली थी।

"आप बैठिए," उन्होंने कहा। उन्होंने सबसे पहले उस लिफ़ाफ़े पर "अत्यावश्यक" की मुहर लगाई। फिर साइकिल उठाई और स्टेशन की ओर चल पड़े, जहाँ रात की गाड़ी में डाक का थैला जाता था।

प्लेटफ़ॉर्म पर गार्ड ने कहा, "थैला बंद हो चुका है।"

"बस एक चिट्ठी है, भाई।"

गार्ड ने उनकी आँखों में देखा और सिर हिला दिया।

तीन दिन बाद खिड़की पर वही बूढ़े सज्जन लौटे, इस बार मुस्कुराते हुए। "बाबू, चिट्ठी वक़्त पर पहुँची। मेरी पत्नी ने कहा कि यह उसका सबसे अच्छा जन्मदिन था।"

दीनानाथ ने कुछ नहीं कहा। बस खिड़की के पीछे बैठे-बैठे उन्हें लगा कि तीस साल की नौकरी में आज पहली बार किसी ने उनका नाम पूछा है। बूढ़े ने पूछा था, "आपका नाम?"

"दीनानाथ।"

"तो दीनानाथ जी, आप सिर्फ़ डाकिया नहीं, लोगों की ख़ुशियों के कुली हैं।"

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026