उस दिन सुबह से आसमान काला था। किसान हरिया ने खेत की ओर देखा और माथे पर हाथ रख लिया। फ़सल कटकर खलिहान में पड़ी थी, और बारिश का मतलब था महीनों की मेहनत का पानी हो जाना।
उसने बेटे को आवाज़ दी। "जल्दी कर, तिरपाल निकाल।"
पर तिरपाल बहुत छोटा था। आधी फ़सल ढकी जा सकती थी, आधी नहीं। हरिया सोचता रहा कि कौन-सा आधा बचाए।
पड़ोस के खेत में मंगू काका भी यही परेशानी लिए खड़े थे। उनके पास तिरपाल तो था ही नहीं।
हरिया ने मंगू की ओर देखा, फिर अपनी फ़सल की ओर। उसने बेटे से कहा, "तिरपाल को बीच से काट दे।"
"बापू, पर तब दोनों तरफ़ की फ़सल थोड़ी-थोड़ी भीगेगी!"
"भीगने दे। पर किसी एक की पूरी नहीं डूबेगी।"
उन्होंने तिरपाल के दो हिस्से किए। एक अपनी ओर, एक मंगू काका की ओर। दोनों ने मिलकर बाँस गाड़े, रस्सियाँ बाँधीं और जैसे-तैसे अनाज के ढेर ढक दिए।
थोड़ी देर में बारिश टूटकर बरसी। तिरपाल के किनारों से पानी भीतर आया और कुछ अनाज भीग गया। हरिया और मंगू दोनों भीगते हुए बोरियाँ खिसकाते रहे। सूरज निकलने तक बहुत थका हुआ दिन बीत चुका था।
अगली सुबह हरिया ने देखा कि उसकी चौथाई फ़सल ख़राब हुई थी और मंगू की भी। पर बाकी तीन हिस्से सूखे थे।
मंगू काका ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "अगर तू पूरा तिरपाल ख़ुद ओढ़ लेता तो मेरी सारी फ़सल चली जाती।"
हरिया ने मुस्कुराकर कहा, "काका, आज तिरपाल कट गया, पर पड़ोस बच गया। यही बड़ा नफ़ा है।"
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026