कथावर्स
भावनात्मक
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आख़िरी बस

आख़िरी बस के कंडक्टर का एक नियम और एक लड़की की देर रात की वापसी।

३ मिनट में पढ़ें · ५२१ शब्द

रात के साढ़े नौ बजे थे। क़स्बे के बस-अड्डे पर आख़िरी बस खड़ी थी, जो रोज़ गाँव खेड़ापुर तक जाती थी। ड्राइवर इंजन चालू कर चुका था, पर कंडक्टर रामदीन दरवाज़े पर खड़ा सड़क की ओर देख रहा था।

"चलो भाई, देर हो रही है," एक सवारी ने कहा।

"बस पाँच मिनट," रामदीन ने बिना मुड़े जवाब दिया।

पाँच मिनट बीते, फिर पाँच और। बस में बैठे लोग कुनमुनाने लगे। रामदीन की आदत सब जानते थे। आख़िरी बस वह तब तक नहीं चलने देता था, जब तक कोई भागता हुआ सवार न हो जाए, या यह तसल्ली न हो जाए कि कोई छूटा नहीं है। लोग मज़ाक़ में कहते थे कि रामदीन की घड़ी में आख़िरी बस का समय चलता ही नहीं।

तभी सड़क के मोड़ पर एक परछाईं दौड़ती दिखाई दी। एक लड़की थी, कंधे पर झोला, हाथ में एक भूरा लिफ़ाफ़ा, साँस फूली हुई। वह सीढ़ी पर चढ़ी तो रामदीन ने उसका झोला पकड़कर ऊपर खींच लिया।

"टिकट खेड़ापुर का," लड़की ने हाँफते हुए कहा।

रामदीन ने टिकट काटा और घंटी बजा दी। बस चल पड़ी।

लड़की खिड़की के पास बैठी और लिफ़ाफ़े को सीने से लगाए रही। कुछ देर बाद उसने धीरे से पूछा, "आपने मेरे लिए रुककर इंतज़ार क्यों किया? आपको तो पता भी नहीं था कि मैं आ रही हूँ।"

रामदीन हँसा। "बेटी, मुझे भी नहीं पता था कि कौन आएगा। बस इतना पता था कि कोई न कोई आएगा।"

"रोज़ ऐसा करते हैं?"

"बारह बरस से।" उसने खिड़की के बाहर अँधेरे में देखा। "मेरी बेटी भी एक रात ऐसे ही भागती हुई आई थी। बस निकल चुकी थी। वह अड्डे पर अकेली रह गई, और दूसरे दिन तक नहीं पहुँच पाई। कुछ नहीं हुआ उसे, ख़ुदा का शुक्र है। पर मैं उस रात बस में बैठा हुआ इंतज़ार करता रहा कि कोई हाथ हिलाए। उस दिन मैंने तय किया कि जो भी देर से आएगा, उसके लिए मेरी बस रुकेगी।"

लड़की चुप हो गई। उसने लिफ़ाफ़े को देखा। उसमें शहर के कॉलेज का दाख़िला-पत्र था। वह आज सुबह से लाइन में खड़ी रही थी, फिर भी आख़िरी खिड़की बंद होने से पहले काग़ज़ मिल गया। गाँव में किसी को पता नहीं था कि वह आज गई है। पिता तो मना कर चुके थे।

"मैं घर जाकर क्या कहूँगी," उसने लगभग अपने आप से कहा।

रामदीन ने कुछ नहीं कहा। बस अँधेरी सड़क पर हिचकोले खाती रही।

खेड़ापुर के चौराहे पर बस रुकी। ठंडी हवा चल रही थी। नीचे, पीपल के पास, एक आदमी लालटेन लिए खड़ा था। लड़की ने उसे पहचान लिया। वह उसके पिता थे। वे शाम से वहीं खड़े थे, यह सोचकर कि शायद उनकी बेटी इसी बस से लौटे।

वह सीढ़ी पर ठिठक गई। पिता ने लालटेन ऊपर उठाई। उनकी नज़र उस भूरे लिफ़ाफ़े पर गई, फिर बेटी के चेहरे पर।

"देर हो गई," पिता ने बस इतना कहा। फिर थोड़ा रुककर बोले, "पर आ तो गई।"

लड़की की आँखें भर आईं। वह उतरकर पिता के पास आई। रामदीन ने गाड़ी को गियर में डाला और ड्राइवर से कहा, "चलो, अब चलो।"

बस आगे बढ़ गई। पीछे सड़क पर लालटेन की रोशनी में दो परछाइयाँ साथ-साथ गाँव की ओर चल रही थीं।

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026