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भावनात्मक
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दादी का संदूक

दादी की डायरी में बड़ी होती मिनी की हर पहली बात।

२ मिनट में पढ़ें · २४९ शब्द

दादी के गुज़र जाने के बाद उनका लकड़ी का संदूक कमरे के कोने में पड़ा रहा। किसी की हिम्मत नहीं हुई उसे खोलने की। एक दिन तेरह साल की मिनी ने ताला खोलने की ज़िद पकड़ ली।

माँ ने रोका, "रहने दे, बेटा। उसमें दादी की चीज़ें हैं।"

"तभी तो खोलना है," मिनी ने कहा।

ताला पुराना था और चाबी दादी की तुलसी की माला में लटकी मिली। संदूक चरमराकर खुला। ऊपर कपड़े की एक तह थी, नीचे सूखे फूलों की ख़ुशबू।

पहली चीज़ एक छोटी-सी डायरी निकली। मिनी ने पन्ना पलटा। दादी की टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में लिखा था: "आज मिनी ने पहली बार मुझे दादी कहा।" नीचे तारीख़ थी, ग्यारह साल पुरानी।

मिनी ने अगला पन्ना पढ़ा: "आज मिनी गिर पड़ी, घुटने में चोट लगी। मैंने हल्दी लगाई। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर वह हँस रही थी।"

हर पन्ने पर मिनी थी। उसकी हर बात, हर शरारत, हर पहली बार। दादी ने बिना किसी को बताए पूरी डायरी में उसे बड़ा होते दर्ज किया था।

आख़िरी पन्ने पर लिखा था: "मिनी, जब तू यह पढ़ेगी, मैं शायद न रहूँ। पर याद रखना, मैंने तुझे जितना देखा, उससे ज़्यादा महसूस किया। जब भी डर लगे, तो समझना कोई तुझे दूर से देख रहा है।"

मिनी की आँखें भर आईं। माँ चुपचाप आकर उसके पास बैठ गई। दोनों ने साथ में पूरी डायरी पढ़ी।

उस रात मिनी ने अपनी अलमारी से एक नई कॉपी निकाली और पहले पन्ने पर लिखा: "आज माँ और मैंने दादी को फिर से सुना।"

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026