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पंचायत का नल

एक नल, एक झगड़ा और एक छात्रा का सीधा-सा हल।

२ मिनट में पढ़ें · २६० शब्द

रामपुर गाँव में पूरे मोहल्ले के लिए एक ही सार्वजनिक नल था। सुबह उस पर पानी भरने वालों की लंबी कतार लग जाती और अक्सर झगड़ा हो जाता कि पहले किसकी बारी है।

सरपंच ने पंचायत बुलाई। सब लोग आए और सबने अपनी-अपनी शिकायत सुनाई। किसी ने कहा कि दूसरा आदमी दो बार बाल्टी भर ले जाता है। किसी ने कहा कि बूढ़ों को पहले भरने देना चाहिए। पंचायत देर तक चलती रही, पर कोई हल नहीं निकला।

आख़िर में सबसे पीछे बैठी दसवीं की छात्रा सुमन खड़ी हुई। "चाचा जी, एक बात कहूँ?"

सरपंच ने सिर हिलाया।

"हर परिवार को एक पर्ची दे दीजिए, जिस पर उसका नंबर लिखा हो। रोज़ सुबह नंबर बदल जाए। जिस दिन जिसका नंबर पहला हो, वह पहले भरे। बूढ़े और बीमार के लिए अलग से एक नंबर रख दीजिए, जो हमेशा पहला रहेगा।"

भीड़ में कानाफूसी हुई। एक बुज़ुर्ग बोले, "यह तो बच्चों जैसी बात है।"

सरपंच ने कहा, "बच्चों जैसी है, पर आज़माने में क्या हर्ज़ है?"

अगली सुबह पर्चियाँ बँटीं। पहले दिन थोड़ी गड़बड़ हुई, पर दूसरे दिन सब ठीक हो गया। जिनका नंबर देर से आता था, वे आराम से चाय पीकर आते। नल पर शोर कम हुआ और लोग एक-दूसरे का हाल पूछने लगे।

एक हफ़्ते बाद वही बुज़ुर्ग सुमन के पास आए। "बेटी, मैंने उस दिन तुझे बच्चा कहा था। आज मेरी बारी पहले थी, और मैंने पानी भरते हुए पहली बार पड़ोसी से बात की।"

सुमन हँस पड़ी। "चाचा जी, नल का पानी सबके लिए है। बस बारी तय हो जाए तो झगड़ा ख़ुद चला जाता है।"

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026