लल्लन चाचा ने बाज़ार से एक घड़ी ख़रीदी। दुकानदार ने कहा, "साहब, असली स्विस है, सिर्फ़ तीन सौ में।"
लल्लन चाचा ने पहले ही समझ लिया था कि स्विस में स्विस जैसा कुछ नहीं होगा, पर तीन सौ में डायल पर सोने जैसी चमक देखकर उनका मन बहल गया। घर आकर उन्होंने सबको दिखाई।
"अरे चाचा, यह तो नकली है," भतीजे ने कहा।
"नकली? ज़रा देखो, कितनी सुई घूम रही है।"
"वह तो हर घड़ी की घूमती है।"
अगले दिन चाचा घड़ी पहनकर दफ़्तर गए। साहब ने मीटिंग दस बजे रखी थी। चाचा की घड़ी में नौ बजकर पचास हुए थे, वे आराम से चाय पीते रहे। जब दफ़्तर पहुँचे तो मीटिंग ख़त्म हो चुकी थी।
"क्या हुआ लल्लन, देर कैसे?"
"साहब, घड़ी धीमी चल रही थी।"
"तो नई ख़रीद लो।"
चाचा घर लौटे और घड़ी का ग़ुस्सा निकालने के लिए उसे दीवार पर टाँग दिया। घड़ी वहीं टिक-टिक करती रही।
अगली सुबह चाचा ने देखा कि घड़ी ठीक साढ़े सात बजा रही थी। उन्होंने मोबाइल देखा, सचमुच साढ़े सात। उन्होंने आँखें मलीं।
"अरे, आज ठीक चल रही है!"
दिन में वह फिर पंद्रह मिनट पीछे हो गई। पर चाचा अब समझ चुके थे। उन्होंने दीवार पर पर्ची चिपका दी: "इस घड़ी में पंद्रह मिनट जोड़कर पढ़ें।"
आज भी उनके घर आने वाले मेहमान उसी घड़ी को देखकर पूछते हैं, "यह कितनी पीछे है?" और चाचा गर्व से कहते हैं, "ठीक पंद्रह मिनट। और इतनी ईमानदार घड़ी तुम्हें कहीं नहीं मिलेगी।"
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026