शर्मा जी की एक अजीब आदत थी। सुबह की पहली चाय वे तब तक नहीं पीते थे जब तक पत्नी सामने न बैठी हो। पत्नी हँसकर कहती, "इतनी बड़ी उम्र में भी बच्चों जैसी ज़िद।"
एक सुबह पत्नी मायके चली गईं। शर्मा जी ने ख़ुद चाय बनाई, कप उठाया और अनायास पत्नी की कुर्सी की ओर देखा। कुर्सी ख़ाली थी।
उन्होंने चाय की चुस्की ली। फीकी लगी। चीनी डाली थी, फिर भी फीकी। उन्होंने एक चम्मच और डाली। फिर भी वही स्वाद।
अगले दिन उन्होंने चाय बनाई ही नहीं। बाहर गली के नुक्कड़ वाले की चाय पी, पर वह भी बेस्वाद निकली। तीसरे दिन उन्होंने सोचा कि शायद चाय की पत्ती ख़राब हो गई है। नई पत्ती ली। चौथे दिन दूध बदला।
पाँचवें दिन पड़ोस के गुप्ता जी ने पूछा, "क्या बात है शर्मा जी, इन दिनों उदास दिखते हैं?"
"चाय अच्छी नहीं बन रही," शर्मा जी बोले। "सब कुछ बदल दिया, पर स्वाद नहीं लौटा।"
गुप्ता जी हँस पड़े। "भाई, चाय में मसाला भाभी जी का होता था। शक्कर-पत्ती तो हर दुकान में मिल जाती है।"
शर्मा जी कुछ पल चुप रहे। फिर उठे और फ़ोन उठाकर पत्नी को मिलाया। "सुनो, कब आ रही हो?"
"क्यों, कुछ हुआ क्या?"
"चाय अच्छी नहीं बनती तुम्हारे बिना," उन्होंने झेंपते हुए कहा।
फ़ोन के उस पार हँसी गूँजी। "मैं कल शाम तक आ जाऊँगी। तब तक फीकी चाय पीकर काम चलाइए।"
अगली सुबह कुर्सी भरी हुई थी और चाय की पहली चुस्की फिर से मीठी लगी।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026