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हास्य
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चाय की उधारी

एक चाय की दुकान की बही और उधार चुकाने का अनोखा सौदा।

३ मिनट में पढ़ें · ४७० शब्द

शर्मा टी स्टॉल के बाहर एक तख़्ती टँगी थी: "आज नक़द, कल उधार।" पर पूरे मोहल्ले को पता था कि कल कभी आता नहीं, इसलिए उधार चलता रहता था।

भोला शर्मा के पास एक मोटी लाल बही थी। उसमें हर ग्राहक का हिसाब था। सबसे ऊपर के पन्ने पर पांडेजी का नाम था, जिनके आगे लिखा था: "चौदह सौ बत्तीस रुपये।" पांडेजी रिटायर्ड मास्टर थे और रोज़ सुबह छह बजे आकर बेंच पर बैठ जाते। अख़बार पढ़ते, दो कप चाय पीते, और जाते समय कहते, "भोला, लिख लेना।"

भोला लिख लेता। हर महीने सोचता कि आज माँगूँगा, और हर महीने पांडेजी को देखकर माँगने वाला शब्द उसके गले में ही अटक जाता।

एक दिन भोले के बेटे गुड्डू ने स्कूल से आकर बस्ता पटका। "पापा, अंग्रेज़ी की परीक्षा में फिर कम नंबर आए। मैं पास नहीं हो पाऊँगा।"

भोला ने बही बंद करके बेटे को देखा। उसे ख़ुद अंग्रेज़ी नहीं आती थी। तख़्ती पर "Tea" भी उसने दूसरों से पूछकर लिखवाया था।

अगली सुबह पांडेजी आए तो भोला ने चाय के साथ एक काग़ज़ भी रख दिया। "मास्टरजी, हिसाब का मामला है। आपके चौदह सौ बत्तीस रुपये हो गए हैं।"

पांडेजी ने चश्मा नीचे खिसकाया। "अरे, इतने हो गए? मैंने सोचा था सात-आठ सौ होंगे।"

"बही कभी झूठ नहीं बोलती, मास्टरजी।"

पांडेजी हँस पड़े। "बही झूठ नहीं बोलती, पर बही का मालिक हिसाब में नरमी बरतता है। ठीक है भोला, पैसे तो पेंशन आने पर दूँगा। उसमें अभी तीन हफ़्ते हैं। तब तक एक सौदा करते हैं।"

"कैसा सौदा?"

"तुम्हारे गुड्डू को मैं रोज़ शाम एक घंटा अंग्रेज़ी पढ़ाऊँगा। बदले में उधार की रक़म में से हर दिन पचास रुपये कटते जाएँगे।"

भोला पहले तो कुछ समझा नहीं, फिर उसने सिर खुजलाया। "पर मास्टरजी, पचास रुपये रोज़ के हिसाब से तो आपका पूरा उधार क़रीब उनतीस दिन में उतर जाएगा।"

"तो उतरने दो," पांडेजी बोले। "पेंशन आने तक जो बचेगा, वह मैं नक़द दे दूँगा। यही तो गणित है भोला, हिसाब दोनों तरफ़ से चलता है।"

उस दिन से शाम को चाय की भट्टी के पास, कड़ाही और गिलासों के बीच, एक छोटी-सी कक्षा लगने लगी। गुड्डू "A for Apple" से शुरू हुआ, और तीसरे हफ़्ते तक वह ग्राहकों को चाय देते समय कहता, "Sir, your tea is ready."

तीसरे हफ़्ते के अंत में परीक्षा हुई। गुड्डू के उन्नीस नंबर बढ़ गए।

पेंशन वाले दिन पांडेजी आए और बही के सामने पैसे गिनकर रखने लगे। भोला ने उनका हाथ रोक लिया। "मास्टरजी, इक्कीस दिन के पचास-पचास रुपये तो कट चुके हैं। अब आपके नाम सिर्फ़ तीन सौ बयासी रुपये बचे हैं।"

"तो ये तीन सौ बयासी ले लो।"

भोला ने बही उठाई, पांडेजी वाला पन्ना खोला और क़लम चलाकर पूरी लाइन पर आड़ी रेखा खींच दी। फिर उसके नीचे लिखा: "हिसाब बराबर। चाय जारी।"

तख़्ती पर उस दिन से एक पंक्ति और जुड़ गई: "पढ़ाने वालों को पहली चाय मुफ़्त।"

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026