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लघुकथा
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आख़िरी स्टेशन का मास्टर

सूने स्टेशन पर हर गाड़ी के साथ उतरती एक कहानी।

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उस छोटे-से स्टेशन पर दिन में सिर्फ़ दो गाड़ियाँ रुकती थीं। एक सुबह की, एक शाम की। बाक़ी समय वहाँ सन्नाटा रहता और स्टेशन मास्टर हरिप्रसाद अपनी कुर्सी पर बैठकर पुरानी फ़ाइलों को सँवारते रहते।

लोग पूछते, "इतने सूने स्टेशन पर क्या मिलता है आपको?"

हरिप्रसाद मुस्कुराते। "हर गाड़ी के साथ एक कहानी उतरती है, साहब।"

एक शाम की गाड़ी से एक युवक उतरा। हाथ में सूटकेस, आँखों में थकान। वह प्लेटफ़ॉर्म की बेंच पर बैठ गया और देर तक कुछ नहीं बोला।

हरिप्रसाद ने चाय मँगाई और उसके पास रख दी। "शहर लौटना है या यहीं रहना है?"

युवक चौंका। "आपको कैसे पता कि मैं शहर से आया हूँ?"

"यहाँ उतरने वाले दो ही तरह के होते हैं: या तो घर लौटे हुए, या कहीं से हारकर भागे हुए।"

युवक की आँखें भर आईं। "नौकरी चली गई। घर वालों को क्या मुँह दिखाऊँ?"

हरिप्रसाद ने सिर हिलाया। "इसी बेंच पर पैंतीस साल पहले एक लड़का बैठा था। वह भी हारकर लौटा था। आज वह इस स्टेशन का मास्टर है।"

युवक ने उनकी ओर देखा। हरिप्रसाद की आँखों में हल्की-सी नमी थी, पर होंठों पर स्थिर मुस्कान।

"घर जाओ," उन्होंने कहा। "तुम्हारी माँ ने खाना बनाया होगा।"

अगली सुबह की गाड़ी से हरिप्रसाद ने देखा कि वही युवक प्लेटफ़ॉर्म पर लौटकर आया है, चेहरे पर नई चमक लिए। "मास्टर साहब, मैं फिर कोशिश करने जा रहा हूँ।"

हरिप्रसाद ने झंडी हिलाई। गाड़ी चल पड़ी। उन्होंने अपनी फ़ाइल में एक नई प्रविष्टि लिखी: "आज एक और कहानी दोबारा शुरू हुई।"

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026