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फ़ाइल नंबर सत्रह

एक बेंच की मरम्मत की अर्ज़ी और सत्रह मेज़ों की यात्रा।

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बाबू घनश्याम की मेज़ पर फ़ाइलों का पहाड़ था, और उस पहाड़ की चोटी पर एक पतली-सी हरी फ़ाइल थी, जिसके ऊपर लिखा था: "फ़ाइल नंबर सत्रह: उद्यान की बेंच की मरम्मत।"

बेंच का मामला सीधा था। नगर के उद्यान में एक लकड़ी की बेंच थी, जिसकी एक टाँग गल चुकी थी। रोज़ शाम को वहाँ बैठने आने वाले पेंशनर रामस्वरूप बाबू ने एक अर्ज़ी लिखी थी: "कृपया बेंच ठीक करवाएँ, ताकि बुज़ुर्ग बैठ सकें।" अर्ज़ी में कुल तीन पंक्तियाँ थीं।

अर्ज़ी विभाग में पहुँची। पहले मेज़ पर दर्ज हुई, दूसरी पर उसकी नक़ल बनी, तीसरी पर प्रमाणित हुई, चौथी पर टिप्पणी लिखी गई कि "विचारार्थ प्रस्तुत।" पाँचवीं मेज़ से उसे छठी, फिर सातवीं पर भेजा गया। हर मेज़ पर एक बाबू था, और हर बाबू के पास एक लाल स्याही और एक हरी स्याही।

सत्रहवीं मेज़ तक पहुँचते-पहुँचते अर्ज़ी तीन महीने बूढ़ी हो चुकी थी। वहाँ बैठे बड़े साहब ने फ़ाइल खोली, चश्मा ठीक किया, और आदेश दिया: "मरम्मत की स्वीकृति दी जाती है। परंतु बेंच की वर्तमान स्थिति का निरीक्षण कर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।"

निरीक्षण के लिए तीन कर्मचारी उद्यान पहुँचे। वे बेंच के पास खड़े हुए, और फ़ोटो खींचे। उनमें से एक ने नोट किया: "बेंच की एक टाँग अत्यधिक क्षतिग्रस्त है।" दूसरे ने लिखा: "टाँग पूर्णतः गल चुकी है।" तीसरे ने जोड़ा: "बेंच अब बेंच कहलाने योग्य नहीं रह गई है।"

यह रिपोर्ट अगले महीने सत्रहवीं मेज़ पर लौटी। साहब ने रिपोर्ट पढ़कर फ़ैसला लिखा: "चूँकि बेंच अब बेंच नहीं रही, अतः मरम्मत का प्रश्न नहीं उठता। नई बेंच के लिए नई फ़ाइल खोली जाए।"

नई फ़ाइल का नाम पड़ा: "फ़ाइल नंबर अट्ठारह।"

उधर रामस्वरूप बाबू रोज़ शाम उद्यान में आते। बेंच अब थी ही नहीं। वे घास पर अख़बार बिछाकर बैठ जाते और पास आए बच्चों से कहते, "देखो, यह वह जगह है जहाँ कभी बेंच होती थी। उसकी याद में पूरे तीन महीने चले काग़ज़ हैं।"

एक दिन उन्होंने बाबू घनश्याम को वहीं घास पर बैठे देखा, जो ख़ुद टहलने आए थे। रामस्वरूप बाबू मुस्कुराए। "बाबूजी, फ़ाइल कहाँ पहुँची?"

घनश्याम ने सँकोच से कहा, "अट्ठारहवीं मेज़ पर।"

"तो अब मैं एक काम करूँ?" रामस्वरूप बाबू ने जेब से एक छोटी-सी कील और हथौड़ी निकाली, और पास पड़ी एक पुरानी लकड़ी की पट्टी उठाई। "यह मैं ख़ुद लगा देता हूँ, और आप भी हाथ लगाइए।"

पंद्रह मिनट में गल चुकी टाँग की जगह एक नई पट्टी ठुक गई। बेंच बैठने लायक़ हो गई।

घनश्याम ने उस पर बैठकर देखा। "वाह, बेंच बन गई।"

"बाबूजी," रामस्वरूप बाबू ने कहा, "यह फ़ाइल कब बंद करेंगे?"

घनश्याम ने अगले दिन फ़ाइल उठाई और उस पर लाल स्याही से लिखा: "कार्य संपन्न। फ़ाइल बंद।" वह जानता था कि सत्रह मेज़ों से जो काम नहीं हो पाया था, वह दो आदमियों ने पंद्रह मिनट में कर दिया था।

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026