कथावर्स
बाल-कथा
बाल-कथा

चाँद का टुकड़ा

आरव चाँद माँगता है और चाँदनी बाँटना सीखता है।

२ मिनट में पढ़ें · २४० शब्द

नन्हा आरव हर रात खिड़की से चाँद को देखता और माँ से कहता, "माँ, मुझे चाँद का एक टुकड़ा चाहिए।"

माँ हँसकर टाल देती। "सो जा, बेटा।"

एक रात आरव ने ठान लिया कि वह चाँद का टुकड़ा लेकर रहेगा। वह चुपके से छत पर गया और सीढ़ी लगाकर ऊपर चढ़ने लगा, पर चाँद दूर का दूर ही रहा। थककर उसने आसमान से कहा, "चाँद दादा, एक टुकड़ा दे दो।"

आसमान ने हवा में हल्का-सा हाथ हिलाया। "चाँद बहुत दूर है, आरव। पर तुम चाहो तो मैं तुम्हें उसकी चाँदनी दे सकता हूँ।"

"चाँदनी?"

"हाँ। अपनी हथेली खोलो।"

आरव ने हथेली फैलाई। उसमें चाँद की मद्धम रोशनी उतर आई। सफ़ेद, ठंडी और बहुत हल्की।

"यह तो अपने आप ग़ायब हो रही है!" आरव ने घबराकर कहा।

"क्योंकि चाँदनी पकड़ने की चीज़ नहीं है। यह बाँटने की चीज़ है।"

आरव ने सोचा। फिर वह दौड़कर नीचे उतरा, अपने सोते हुए छोटे भाई के पास गया और खिड़की का पर्दा हटा दिया। चाँदनी भाई के चेहरे पर उतर आई। छोटा भाई नींद में मुस्कुराया।

आरव ने दादी के कमरे का पर्दा हटाया, फिर माँ के कमरे का। पूरे घर में चाँदनी भर गई।

अगली सुबह माँ ने पूछा, "रात को किसने पर्दे हटाए?"

आरव शरमाते हुए बोला, "मैंने। मुझे चाँद का टुकड़ा चाहिए था, पर पता चला कि वह सबके लिए है।"

माँ ने उसे गले लगा लिया। उस रात उसने चाँद से कुछ नहीं माँगा। बस खिड़की खुली छोड़कर सो गया।

कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026