पहाड़ के एक छोटे गाँव में डाकिया हर शाम मोड़ के पीछे से साइकिल की घंटी बजाता हुआ आता था। और रोज़ उसी समय एक बूढ़ी औरत, पार्वती देवी, अपने आँगन में बैठी इंतज़ार करती थी।
डाकिया रमेश को यह आदत अजीब लगती थी। चिट्ठी अक्सर नहीं होती थी, पर पार्वती देवी फिर भी हर शाम बैठी मिलती। रमेश साइकिल रोककर कहता, "आज कुछ नहीं आया, अम्मा।"
पार्वती देवी मुस्कुरा देतीं। "कोई बात नहीं बेटा, कल आएगा।"
उनका बेटा शहर में नौकरी करता था और पिछले चार साल से उसकी कोई ख़बर नहीं थी। रमेश ने कई बार सोचा कि वह उन्हें समझाए, पर हर बार उनकी उम्मीद देखकर चुप रह जाता।
एक दिन रमेश ने ख़ुद पते वाली पुरानी पर्ची निकाली और शहर के एक दोस्त को फ़ोन किया। "इस पते पर जाकर देख सकता है कि कोई रहता है या नहीं?"
हफ़्ते भर बाद जवाब आया। बेटा जीवित था। उसकी नौकरी चली गई थी, उधार में डूबा था, और शर्म के मारे घर पत्र नहीं लिख पा रहा था।
रमेश ने उसे अपना फ़ोन नंबर भेजा। बेटे ने रोते हुए बात की। रमेश बोला, "भाई, माँ को कुछ नहीं चाहिए, बस तेरी लिखावट चाहिए। दो पंक्तियाँ भेज दे, चाहे जैसी भी हों।"
अगले हफ़्ते डाक में एक पोस्टकार्ड आया। उस पर सिर्फ़ तीन शब्द थे: "माँ, मैं ठीक हूँ।"
रमेश उस शाम साइकिल की घंटी बजाता हुआ तेज़ी से मोड़ पर आया। पार्वती देवी आँगन में बैठी थीं। उसने पोस्टकार्ड उनके हाथ में रखा।
उन्होंने पढ़ा नहीं, बस काँपते हाथों से उसे सीने से लगा लिया। इतने बरसों में पहली बार उनका इंतज़ार थक कर नहीं, भरकर बैठा था।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026