गाँव के बाहर एक पुराना कुआँ था, जिसके बारे में सब कहते थे कि उसमें भूत रहता है। रात होते ही उधर कोई नहीं जाता था। बच्चे उसे दूर से देखकर डर जाते थे।
एक रात दर्ज़ी का बेटा मोहन देर से लौट रहा था। कुएँ के पास से गुज़रते हुए उसे भीतर से अजीब-सी आवाज़ सुनाई दी। कोई धीमे-धीमे कराह रहा था।
मोहन के पैर काँपने लगे। वह भागना चाहता था, पर आवाज़ फिर आई, इस बार साफ़ शब्दों में। "कोई है? मुझे निकालो।"
मोहन ठिठक गया। भूत इंसान की भाषा में नहीं बोलते, उसने सोचा। उसने हिम्मत करके टॉर्च कुएँ में डाली। नीचे एक बूढ़ा आदमी रस्सी पकड़े लटका था, भीगा हुआ और काँपता हुआ।
"चाचा, आप यहाँ कैसे?"
"बेटा, मैं पानी निकालने आया था, पैर फिसल गया। दो घंटे से चिल्ला रहा हूँ, पर लोग डर के मारे इधर आते ही नहीं।"
मोहन ने दौड़कर पास की झोपड़ी से लंबी रस्सी और दो आदमियों को बुलाया। सबने मिलकर बूढ़े को ऊपर खींचा। वह बच गया।
अगली सुबह पूरे गाँव में बात फैल गई। लोग कुएँ के पास इकट्ठा हुए। किसी ने कहा, "तो इतने बरस हम एक आदमी की आवाज़ से डरते रहे?"
सरपंच ने कुएँ के चारों ओर एक छोटी दीवार बनवा दी और ऊपर एक घंटी लगवा दी। "अब जो भी फँसे, घंटी बजा दे।"
उस दिन के बाद बच्चे कुएँ के पास खेलने लगे। भूत की कहानी धीरे-धीरे लोगों के मन से मिट गई, पर मोहन को कभी-कभी लगता था कि सबसे बड़ा भूत वह डर था, जो बरसों से लोगों की आँखों पर बैठा रहा।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026