शर्माजी के मोहल्ले में नेटवर्क सिर्फ़ छत के दक्षिणी कोने में आता था। इसलिए हर शाम वहाँ मेला लग जाता। कोई वीडियो कॉल पर बेटे से बात करता, कोई पिज़्ज़ा का ऑर्डर देता, और कोई सिर्फ़ यह देखने आता कि कितनी लकीरें आई हैं।
शर्माजी इस भीड़ से बहुत परेशान थे, क्योंकि छत उन्हीं की थी। एक दिन उन्होंने तख़्ती टाँग दी: "नेटवर्क शुल्क, दस रुपये प्रति घंटा।"
पहले दिन कोई नहीं आया। दूसरे दिन चार लोग आए। चौथे दिन तक भीड़ दोगुनी हो गई, क्योंकि लोगों ने सोचा कि जब पैसे दे रहे हैं तो सुविधा भी तो मिलनी चाहिए।
शर्माजी ने घबराकर कुर्सियाँ मँगवाईं, फिर पानी का मटका, फिर पंखा। धीरे-धीरे छत पर चाय का ठेला भी लग गया। लोग उसे "शर्मा कैफ़े" कहने लगे।
तभी एक दिन नेटवर्क कंपनी वाले आए। बोले, "हमें इस इलाक़े में टावर लगाना है। छत किराये पर चाहिए।"
शर्माजी की आँखें चमक उठीं। "कितना किराया?"
"पाँच हज़ार महीना।"
उन्होंने फ़ौरन हामी भर दी। हफ़्ते भर में टावर लग गया और पूरे मोहल्ले में नेटवर्क आ गया। लोग अपने-अपने घरों में बैठकर बात करने लगे।
छत पर सन्नाटा छा गया। कुर्सियाँ ख़ाली, चाय का ठेला बंद। शर्माजी अकेले छत पर बैठे थे, हाथ में फ़ोन, पूरी चार लकीरें। फ़ोन बजा तो किसी ने नहीं बुलाया, किसी ने नहीं हँसाया।
शाम को उन्होंने वह तख़्ती उतार दी और उसके नीचे नई टाँगी: "छत सबके लिए, चाय मेरी तरफ़ से। बस नेटवर्क की बात मत करना।"
कहते हैं कि अब भी लोग रोज़ शाम को वहाँ जुटते हैं। वे फ़ोन नहीं देखते, एक-दूसरे को देखते हैं।
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026