दादाजी की पुरानी दीवार घड़ी बरसों से बंद पड़ी थी। उसकी सुइयाँ ठीक चार बजकर दस मिनट पर रुकी हुई थीं। घर में सब उसे हटाना चाहते थे, पर दादी हर बार मना कर देती थीं।
बारह साल के आदित्य ने एक दिन दादी से पूछा, "दादी, इस घड़ी को आप इतना क्यों सँभालती हैं? यह तो चलती भी नहीं।"
दादी कुछ देर घड़ी को देखती रहीं। "इसने मेरे जीवन का सबसे बड़ा दिन देखा है। जिस दिन तेरे दादाजी गए, यह उसी समय रुकी थी। मैंने इसे दोबारा चलाने की कोशिश नहीं की।"
आदित्य चुप रहा। उसने घड़ी के पीछे जाकर देखा। एक पुराना चाबी वाला पुर्ज़ा था और भीतर का स्प्रिंग ज़ंग खा चुका था।
अगले दिन वह स्कूल से घड़ीसाज़ के पास गया और बोला, "चाचा, इस घड़ी को ठीक करना है, पर इसकी सुइयाँ चार बजकर दस पर ही रहने दीजिए।"
घड़ीसाज़ हँसा। "बेटा, घड़ी तो चलने के लिए होती है।"
"मैं चाहता हूँ कि यह चले, पर दादी का दिन भी न मिटे।"
घड़ीसाज़ ने कुछ सोचा। फिर बोला, "ठीक है। मैं एक छोटा-सा निशान बना देता हूँ। घड़ी चलेगी, पर चार बजकर दस बजते ही उसमें एक धीमी-सी घंटी बजेगी।"
अगले हफ़्ते घड़ी दीवार पर लौट आई और चलने लगी। दादी ने उसे देखा और हल्के से मुस्कुराईं। शाम को चार बजकर दस पर घंटी बजी। दादी की आँखों में आँसू आ गए, पर इस बार वे भारी नहीं थे।
उन्होंने आदित्य का सिर सहलाया। "तूने घड़ी को चला दिया, बेटा, और मेरे दादाजी को भी बचा लिया।"
कथावर्स के लिए Claude (AI) द्वारा लिखी गई मौलिक कहानी, 2026